पहाड़ के लिए धड़कता दिल प्रेम बहुखंडी

पहाड़ के लिए धड़कता दिल- फ्रेंड्स ऑफ हिमालय

केदारनाथ आपदा प्रभावितों के कल्याण में जुटा है प्रवासी लोगों का संगठन
-उत्तराखंडी संस्कृति और उत्पादकता को बढ़ावा दे रहा संगठन
 
दिल्ली व देश के विभिन्न इलाकों में रहने वाले कुछ प्रवासी उत्तराखंडियों का दिल आज भी पहाड़ के लिए धड़कता है। उनकी सोच है कि पहाड़ फिर से आबाद हो। अपनी थाती और माटी से भावनात्मक रूप से जुड़े कुछ प्रवासी पहाड़ को लेकर जो सपने देखते हैं, उनको धरातल पर उतारने का भी प्रयास करते हैं। ऐसे ही पहाड़ के विकास के लिए समर्पित और संकल्पित प्रवासियों का समूह है फ्रेंड्स आॅफ हिमालय।
यह संगठन वास्तविकता के धरातल पर पहाड़ में काम कर रहा है। फ्रेंड्स आॅफ हिमालय केदारनाथ आपदा में मारे गये लोगों के बच्चों को पढ़ाई में मदद दे रहा है। पिछले तीन साल से वह सामाजिक संस्था धाद के साथ मिलकर 200 से भी अधिक आपदा प्रभावित बच्चों की पढ़ाई का खर्च वहन कर रहा है। इसके अलावा इन बच्चों का स्किल डेवलमेंट का प्रयास भी कर रहा है। संगठन केदारनाथ घाटी की महिलाओं के सशक्तीकरण की दिशा मे काम कर रहा है। इसके तहत संगठन ने धाद के साथ मिलकर महिलाओं के लिए तीन सिलाई-बुनाई सेंटर चला रहा है। इसके अलावा उत्तराखंडी खाद्यान्न एवं प्रसंस्करण स्वायत्त सहकारिता संगठन भी बनाया है। यह संगठन पहाड़ी खाद्यान्न को बढ़ावा दे रहा है ताकि उत्पादकता बढ़ सके और इसका लाभ ग्रामीणों को मिल सके।

उन्नाव जेल में पड़ी संगठन की नींव
फ्रेंड्स आॅफ हिमालय संगठन की बुनियाद उन्नाव जेल में पड़ी। संगठन के प्रेम बहुखंड़ी के अनुसार वर्ष 1994 के दौरान उत्तराखण्ड़ राज्य अपने चरम पर था। वे उन दिनों देहरादून के डीएवी कालेज में पढ़ रहे थे। आंदोलन के दौरान उन्हें व अन्य युवाओं को गिरफ्तार कर उन्नाव जेल भेज दिया गया। जेल में हमने एक संगठन बनाने की सोची जो कि उत्तराखंड के लिए समर्पित हो और पहाड़ के विकास के लिए योजनाओं को धरातल पर उतार सके। पहले संगठन का नाम फ्रेंड्स आॅफ उत्तराखंड था। इसके बाद वर्ष 1999 में मै जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय (जेएनयू) में एमफिल करने के लिए गया तो वहां के रिचर्ड स्टूडेंट्स ने इस नाम पर आपत्ति जतायी तो संगठन का नाम फ्रेंड्स फ्राॅम उत्तराखंड रख दिया गया। वर्ष 2006 में संगठन का नाम बदल कर फ्रंेड्स आॅफ हिमालय रखा गया।

घराट को लेकर रही अहम भूमिका
राज्य गठन के बाद वर्ष 2002-03 में संगठन ने उत्तराखंड में घराट को लेकर व्यापक बहस छेड़ी। संगठन के अनुसार यदि पर्वतीय इलाकों में घराटों को ही अच्छे से संचालित किया जाता तो वहां की आर्थिकी में सुधार होता और पलायन की समस्या को कुछ हद तक रोका भी जा सकता था।
प्रेम बहुखंडी का मानना है कि जब तक हम तकनीकी विकास नहीं करेंगे तो आर्थिकी में सुधार नहीं हो सकता है। हमें विकास के लिए योजनाओं के साथ ही तकनीकी विकास पर भी जोर देना होगा। आम जनता तक तकनीकी जानकारी पहुंचनी चाहिए। फ्रेंड्स आॅफ हिमालय ने हिमाचल के चंबा में भी तकनीकी सपोर्ट का काम किया। इसके अलावा दिल्ली सरकार के सामाजिक सुविधा केन्द्र के प्रोजेक्ट टेक इंडिया के तहत बच्चों व आम लोगों को फंग्शनल इंग्लिश यानी अंग्रेजी की काम चलाऊ जानकारी देने का काम भी किया।

आपदा के बाद केदारघाटी में सक्रिय संगठन
प्रेम बहुखंडी बताते हैं कि जब वर्ष 2013 में केदारनाथ आपदा आई तो धाद के सचिव तन्मय ममगाईं दिल्ली आए। उन्होंने कहा कि आपदा प्रभावितों के लिए कुछ किया जाना चाहिए। उस दौरान प्रभावितों की मदद के लिए सब कुछ न कुछ कर ही रहे थे लेकिन मुझे लगा कि आपदा के बाद पहाड़ से मानव तस्करी बढ़ सकती है, विशेषकर बच्चों की। तो हमने यह तय किया कि आपदा प्रभावित बच्चों को स्कालरशिप दें ताकि उनकी पढ़ाई न छूटे और भविष्य खतरे में न पड़े। हमने तय किया कि पहले दस-दस बच्चों को न्यूनतम खर्चा दें ताकि उनकी पढ़ाई न रूके। तय किया गया कि वर्ष में दस हजार रूपये एक बच्चे की पढ़ाई पर खर्च किये जायेंगे। वहां की प्रभावित महिलाओं के लिए रिन्यू हिमालय के नाम से लमगौड़ा,सारी व किमोड़ा गांव मेें सिलाई-बुनाई सेंटर खोले गये।

स्किल डेवलपमेंट के प्रयास
प्रेम का कहना है कि आपदा प्रभावित बच्चे क्या सीख रहे हैं,उसकी समीक्षा के लिए हमने उन स्कूलों के शिक्षकों व सामाजिक कार्यकर्ताओं की मदद ली और समर कैम्प में बच्चों की गतिविधियों का ऐसेमेंट किया। इस वर्ष जून माह में सारी गांव में कैम्प लगाया गया। मेरा मानना है कि एक्पोजर मिले तो ही आगे बढ़ने के लिए रास्ता मिलता है। आपदा प्रभावित बच्चों में स्किल डेवलपमेंट के प्रयास किये जा रहे हैं। इसके तहत उन्हें कंप्यूटर ज्ञान के साथ ही अन्य विधाओं की जानकारी भी दी जा रही है। इसके अलावा गणित व विज्ञान की शिक्षा पर जोर दिया जा रहा है। महिलाओं को कृषि और बागवानी की तकनीकी व वैज्ञानिक पद्धतियों की जानकारी देने का प्रयास किया जा रहा है।

आपदा प्रभावितों की आजीविका
प्रेम बहुखंडी का एक बड़ा अहम सवाल है कि केदारनाथ आपदा के बाद की स्थिति के लिए मंदिर प्रशासन को क्यों नहीं जिम्मेदार नहीं ठहराया जाता ? क्या मंदिर प्रशासन का कोई नैतिक दायित्व नहीं ? इस सवाल को अब तक किसी ने नहीं उठाया है। प्रेम के अनुसार मंदिर प्रशासन को प्रभावितों के जीवन को पटरी पर लाने के लिए प्रयास करने चाहिए। इसी सोच के तहत संगठन अब केदारनाथ मंदिर के प्रसाद को स्थानीय उत्पाद के साथ जोड़कर देख रहा है। संगठन मंदिर समिति के साथ मिलकर प्रसाद की व्यवस्था करने की दिशा में काम कर रहा है ताकि इस प्रसाद से होने वाली आय से स्थानीय लोगों को लाभ मिले। प्रेम कहते हैं कि हर साल चारधाम यात्रा पर आने वाले लोग करोड़ रूपये से भी अधिक का प्रसाद लेते हैं तो इसका लाभ स्थानीय लोगों को मिलना चाहिए। प्रसाद में क्या-क्या दिया जाए इस पर विचार किया जा रहा है। यह प्रसाद पूरी तरह से स्थानीय उत्पादों का ही होगा। उम्मीद है कि अगले वर्ष यह योजना धरातल पर उतर आयेगी। हमारा प्रयास है कि आपदा प्रभावित विधवाएं प्रसाद बनाएं और इसका लाभ उन्ही को मिले।


प्रेम बहुखंडी मूल रूप से पौढ़ी गढ़वाल के तलांई पट्टी के नौगांव निवासी हैं
मौजूदा समय में वह राज्यसभा टीवी में कार्यरत हैं और हर सप्ताह यह भी है मुद्दा के हेड हैं। देहरादून में डीएवी से एमए करने के बाद प्रेम ने जेएनयू से एमफिल किया। उत्तराखंड राज्य आंदोलन में उनका अहम योगदान रहा। सर्व शिक्षा अभियान में उनकी प्रमुख भूमिका रही। वह इसके राष्ट्रीय सलाहकार रहे। उन्होंने स्वामी अग्निवेश के साथ कन्या भ्रूण हत्या रोकने के लिए टंकारा से अमृतसर तक रैली निकाली। ग्राम विकाश के लिए कपाट में कार्य किया। वर्ष 2008 में कांग्रेस के प्रचार केंद्र वार रूम से जुड़ गये और 2009 में वह वार रूम रिसर्च विंग के समन्वयक रहे। वह कांग्रेस की राष्ट्रीय अध्यक्ष सोनिया गांधी के भाषण तैयार करते थे। इसके बाद जब कांग्रेस सत्ता में आई तो वह संसदीय कार्य मंत्रालय में केन्द्रीय मंत्री पवन बंसल के अतिरिक्त निजी सचिव और बाद में केन्द्रीय मंत्री कमलनाथ के निजी सचिव रहे। वर्ष 2014 में उन्होंने राज्यसभा टीवी ज्वाइन किया। इसके अलावा गुजरात में दलित आंदोलन में भी उनकी अहम भूमिका रही है। प्रेम बहुखंडी भले ही देश के किसी भी कोने में रहे हों, लेकिन उनकी सोच और दिल में पहाड़ ही बसता है।


साभार: उत्तरजन टुडे

 

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