उत्तराखंड के अनोखे कौथिग,(kauthig) मेले जो चकित कर दे…

उत्तराखंड अपने रीति रिवाजों, कौथिग (kauthig),मेलो और परंपराओं  के लिए प्रसिद्ध है। आज भी यहां कई ऐसी परंपराएं जिंदा हैं, जिसे पढ़कर आप आश्चर्यचकित हो जाएंगे।

१.गेंदी की कौथिक (kauthig)
गिंदी कौथिग  का मेला पौड़ी जिले कई जगह होता है , मगर थल नदी की बात ही अलग है।  दशकों से चले आ रहे इस मेले में  थलनदी में अजमीर और उदयपुर पट्टियों के लोग चमड़े की २० किलो की  गेंद अपने पक्ष में पाने के लिए संघर्ष करते हैं।
गिंदी कौथिग (गेंद मेला) गिदोरी नाम की महिला की याद में आयोजित किया जाता है। यह महिला दो पट्टियों के थोकदारों (जमींदारों) के संघर्ष में मारी गई थी।
इस त्यौहार के मौके पर यहां एक मेला लगता है, जिसमें आसपास के दस किलोमीटर के दायरे के 25 गांवों से लगभग 2000 ग्रामीण एकजुट होते हैं .

2.देवीधुरा मेला / (Aasadi Kautig)
चंपावत (Champawat) जिले के देवीधुरा (Devidhura) नामक स्थल पर मां वाराहीदेवी मंदिर के प्रांगण में प्रतिवर्ष रक्षा बंधन (श्रावणी पूर्णिमा) के दिन बग्वाल मेले का आयोजन किया जाता है। स्थानीय बोली में इसे आसाडी कौतीक (Aasadi Kautig)’ भी कहा जाता है। इस मेले की मुख्य विशेषता लोगों द्वारा एक दूसरों पर पत्थरों की वर्षा करना है। जिसमें चंयाल (Chanyat), वालिक (Valik), गहड़वाल (Gahdwal) व लमगाडीया (Lamgadiya) चार खामों (Khamon) के लोग भाग लेते हैं। बग्वाल खेलने वालों को द्योके कहा जाता है।

३. मौण मेला
उत्तराखंड में एक ऐसा मेला है, जिसमें मछलियों का सामूहिक शिकार होता है। इसमें 10-50 लोग नहीं, बल्कि हजारों संख्या् में लोग नदी में मछली को पकड़ते हैं इस बार यह मेला 27 जून को था ।
क्या है मौण ? मौण, टिमरू के तने की छाल को सुखाकर तैयार किए गए महीन चूर्ण को कहते हैं। इसे पानी में डालकर मछलियों को बेहोश करने में प्रयोग किया जाता है .मछली मारने के लिए नदी में डाला गया टिमरू का पाउडर पानी के साथ खेतों में पहुंचकर चूहों और अन्य कीटों से फसलों की रक्षा करता है।
राजशाही से चली आ रही है परंपरा

4. बिस्सू मेला
उत्तराखंड में बैसाख मास के आगमन पर जौनसार बावर में जगह-जगह बिस्सू मेला का आयोजन होता है, लेकिन 1898 से ठाणा डांडा में लगातार आयोजित हो रहे इस मेले की ही अलग है।
ठाणा डांडा में करीब 119 साल से यह मेला मनाया जाता है। ढोल-नगाड़ों की थाप पर मेले में लोक संस्कृति के साथ-साथ उत्तराखंड की संस्कृति की झलक देखने को मिलती है। बिस्सू मेले में हिस्सा लेने के लिए जौनसार बावर के साथ ही पड़ोसी राज्य हिमाचल प्रदेश, उत्तरकाशी और टिहरी जिले से भी लोग पहुंचते हैं। ठाणा गांव और बनगांव खत के लोग मिलकर इस मेले का आयोजन करते हैं।

5. मक्खन की होली यानि की (बटर फेस्टिवल) अढूंड़ी उत्सव
उत्तरकाशी मुख्यालय से 42 किलोमीटर की सड़क दूरी तथा भटवाड़ी ब्लाक के रैथल गांव से छह किलोमीटर पैदल दूरी पर स्थित 28 वर्ग किलोमीटर में फैले दयारा बुग्याल में सदियों से अढूंड़ी (बटर फेस्टिवल) उत्सव मनाया जाता आ रहा है। इस मेले मे मक्खन की होली खेलने के साथ ही प्रकृति की पूजा की जाती है .

मेले में आए मेलार्थियों ने इस खास तरह के उत्सव में भाग लेकर मखमली बुग्यालों में मक्खन की होली खेलते है. इस उत्सव में दूर-दूर से पर्यटक पहुंचते है तथा यहां मखमली घास पर मक्खन की होली खेलते हैं। मक्खन की होली खेलने के चलते अढूंड़ी उत्सव को बटर फेस्टिवल के रूप में भी जाना जाता है।

 

6.गागली युद्ध अरबी के डंठलों का युद्ध  

दशहरे के दिन देहरादून जिले में जौनसार बावर क्षेत्र के दो गांवों में कुछ अलग ही नजारा देखने को मिलता है। इस दिन यहां दशहरे के स्थान पर पाइता पर्व मनाया जाता है। यहाँ लोगों के बीच करीब एक घंटे तक भीषण गागली युद्ध होता है . इस युद्ध में किसी की भी हार जीत नहीं होती है। उत्पाल्टा और कुरोली गांव में लोग श्राप से मुक्ति पाने के लिए यह सदियों पुराने रिवाज को निभाते है. इसके बाद दोनों गांवों के लोग एक दूसरे को गले मिलकर पाइता पर्व की बधाइयां देते है . दो सगी बहनों की घासफूस की प्रतिमा को कुएं में विसर्जित किया जाता है .

7.कन्दाली या किर्जी उत्सव
पिथोरागढ़ के चौदस घटी में पार्टी 12 वर्ष के अन्तराल पर अगस्त ,September में कन्दाली या किर्जी उत्सव मनाया जाता है. यह उत्सव एक सप्ताह तक चलता है .
यात्रा के सूचक ढोल एवं नगाड़े बजने लगते है गाँव के लोग इकट्टा होकर ’सैथान’ देवस्थल की और प्रस्थान करते है महिलाये अपनी पारंपरिक वेशभूषा एवं आभुसनो से अलंकृत होकर हाथ में तलवारनुमा रिल और दरांती लेकर  साथ कन्दाली के पौधों पर टूट पड़ती है और देखते ही देखते उसे तहस नहस कर देती है . फिर अक्षयत उचल कर देवी देवताओ का स्मरण किया जाता है तत्पश्चात लोग ढोल की धुन पर नृत्य करते हुए गाँव वापस आ जाते है . इसके पश्चात फलो ,फूलो, मिष्टान एवं मदिरा से लोकदेवताओ का पूजन किया जाता है .
कन्दली के पौधों को नष्ट करने के अवसर पर एक विशेष नृत्य किया जाता है जिसे कन्दाली नृत्य कहते है .

इस उत्सव के सम्बन्ध में के किवदंतिया प्रचलित है . कहा जाता है की एक बार इस क्षेत्र में उत्पन्न होने वाले पौधे कन्दाली के पुष्प को एक विधवा स्त्री के एकलौते पुत्र ने खा लिया जिससे उसकी मौत हो गयी . कही इस विसेले पुष्प को अन्य बच्चे भूलवश न खा ले इस भय से महिलाओ ने कन्दाली के पोधों को डंडो से पीतपीत कर समाप्त कर दिया. किन्तु उसके बीज का नास नहीं हो सका . 12 वर्ष बाद जब इसके पुष्प आते है तो महिलाओ द्वारा इसे नष्ट करने का सामूहिक प्रयास किया जाता है .

8. खतडुवा   पशुधन की कुशलता की कामना का पर्व
उत्तराखण्ड में प्रारम्भ से ही कृषि और पशुपालन आजीविका का मुख्य स्रोत रहा है। सी प्रकार से भादों (भाद्रपद) के महीने में मनाया जाने वाला “खतड़ुवा” पर्व भी मूलत: पशुओं की मंगलकामना के लिये मनाया जाने वाला पर्व है. खतड़ुआ शब्द की उत्पत्ति “खातड़” या “खातड़ि” शब्द से हुई है, जिसका अर्थ है रजाई या अन्य गरम कपड़े. गौरतलब है कि भाद्रपद की शुरुआत (सितम्बर मध्य) से पहाड़ों में जाड़ा धीरे-धीरे शुरु हो जाता है।

इस त्यौहार के दिन गांवों में लोग अपने पशुओं के गोठ (गौशाला) को विशेष रूप से साफ करते हैं. पशुओं को नहला-धुला कर उनकी खास सफाई की जाती है और उन्हें पकवान बनाकर खिलाया जाता है .शाम के समय घर की महिलाएं खतड़ुवा (एक छोटी मशाल) जलाकर उससे गौशाला के अन्दर लगे मकड़ी के जाले वगैरह साफ करती हैं और पूरे गौशाला के अन्दर इस मशाल (खतड़ुवा) को बार-बार घुमाया जाता है और भगवान से कामना की जाती है कि वो इन पशुओं को दुख-बीमारी से सदैव दूर रखें। गांव के बच्चे किसी चौराहे पर जलाने लायक लकड़ियों का एक बड़ा ढेर लगाते हैं गौशाला के अन्दर से मशाल लेकर महिलाएं भी इस ,चौराहे पर पहुंचती हैं और इस लकड़ियों के ढेर में खतड़ुआ” समर्पित किये जाते हैं

इस अवसर पर हल्का-फुल्का आमोद-प्रमोद होता है और ककड़ी को प्रसाद स्वरूप वितरित किया जाता है.

 

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